बजट 2026 में महिलाओं और लड़कियों के लिए निवेश कम


संघीय बजट 2026–27 भारत के जनसंख्या परिवर्तन के महत्वपूर्ण दौर में आया है। पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया और इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ माइग्रेशन एंड डेवलपमेंट की जनसंख्या प्रोजेक्शन्स के अनुसार, प्रजनन दर घट रही है, बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, और 2031 के बाद भारत का जनसंख्या लाभ धीरे-धीरे सीमित होने लगेगा। ऐसे समय में महिलाओं का स्वास्थ्य, सुरक्षा और निर्णय लेने की क्षमता सिर्फ सामाजिक जरूरत नहीं, बल्कि आर्थिक प्राथमिकता है।

“महिलाओं के नेतृत्व में विकास का अर्थ सिर्फ कल्याणकारी योजनाओं से नहीं है; यह भारत के आर्थिक भविष्य की आधारशिला है। अगर बजट 2026 महिलाओं के स्वास्थ्य, सुरक्षा और देखभाल प्रणालियों में ठोस निवेश नहीं करता, तो हम अपने जनसंख्या लाभ के अवसर को खो सकते हैं,” पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया की कार्यकारी निदेशक पूनम मुत्त्रेजा ने कहा।

बजट में कुल आवंटन ₹50.63 लाख करोड़ से बढ़कर ₹53.47 लाख करोड़ किया गया है, यानी लगभग 6 प्रतिशत की वृद्धि। महिलाओं के लिए लक्षित “जेंडर बजट” ₹4.49 लाख करोड़ से बढ़कर ₹5.01 लाख करोड़ हुआ, यानी 12 प्रतिशत की बढ़ोतरी। लेकिन ये बड़े आंकड़े गहरी संरचनात्मक समस्याओं को छिपा देते हैं। अधिकतर धनराशि अभी भी बड़ी योजनाओं में शामिल है, जहाँ महिलाओं के लिए परिणाम देखना मुश्किल है और जवाबदेही भी कम हैI

“जब अधिकांश जेंडर खर्च सामान्य योजनाओं में समाहित हो जाता है, तो महिलाएं लाभार्थी के रूप में अदृश्य हो जाती हैं। स्पष्ट लक्ष्य न होने पर इरादा अक्सर असर में नहीं बदलता,” मुत्त्रेजा ने कहा।

कुल स्वास्थ्य आवंटन ₹95,957.87 करोड़ से बढ़कर ₹1,01,709.21 करोड़ हुआ, यानी सिर्फ 6 प्रतिशत की मामूली वृद्धि। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन में भी लगभग 5.81 प्रतिशत की बढ़ोतरी है। लेकिन परिवार कल्याण के लिए NHM का बजट ₹1,536.97 करोड़ से घटकर ₹1,524.74 करोड़ हो गया, और पूंजीगत व्यय में 1.65 प्रतिशत की कमी आई। ये धनराशि आउटरीच, फ्रंटलाइन वर्कर प्रशिक्षण, मातृत्व देखभाल और गर्भनिरोधक सेवाओं के लिए है।

“यह चिंता का विषय है कि जबकि जनसंख्या रुझान क्षेत्रीय भिन्नताओं को दिखाते हैं, परिवार कल्याण के आवंटन घट रहे हैं। स्थिर या घटते बजट के सहारे प्रजनन संबंधी विकल्पों को कायम नहीं रखा जा सकता,” मुत्त्रेजा ने कहा।

बजट में भारत को वैश्विक बायो-फार्मा हब बनाने के लिए ₹10,000 करोड़ की बायो-फार्मा शक्ति योजना, नए NIPER और राष्ट्रीय क्लिनिकल ट्रायल नेटवर्क जैसी योजनाओं पर जोर है। ये निवेश कुशल रोजगार तो पैदा कर सकते हैं, लेकिन वे उन सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को नहीं सुधारते, जिन पर महिलाएँ रोज़ निर्भर रहती हैं। वृद्ध और संबंधित सेवाओं के लिए प्रस्तावित देखभाल प्रणाली स्वागत योग्य है, लेकिन अगर सामाजिक देखभाल के लिए फंड नहीं मिलेगा तो घरेलू जिम्मेदारियों का बोझ महिलाओं पर ही अधिक रहेगा।

बाल देखभाल और पोषण अभी भी कम फंडेड हैं। सक्षम आंगनवाड़ी और POSHAN 2.0 के लिए आवंटन केवल 5 प्रतिशत बढ़ा है। लगातार बने हुए बाल कुपोषण, पूरे दिन की बाल देखभाल की बढ़ती जरूरत और महिलाओं की कामकाजी भागीदारी में आंगनवाड़ियों की अहम भूमिका को देखते हुए यह अपर्याप्त है।

आंगनवाड़ियों से पोषण, शिक्षा, स्वास्थ्य और बाल देखभाल की उम्मीद की जाती है, लेकिन उन्हें इसके अनुसार धन नहीं मिलता। जब बाल देखभाल व्यवस्था कमजोर होगी, तो महिलाएँ काम नहीं कर पाएंगी,” मुत्त्रजा ने कहा।

महिलाओं की सुरक्षा भी बजट और नीतिगत कथनों के बीच असंतुलन दिखाती है। मिशन शक्ति का बजट 14 प्रतिशत बढ़ा है, लेकिन सुरक्षा और संकट-प्रतिक्रिया सेवाओं के लिए कुल जेंडर बजट का 1 प्रतिशत से भी कम है। साथ ही, स्वच्छ भारत मिशन–अर्बन के लिए आवंटन आधा कर दिया गया, जिससे महिलाओं की सुरक्षा और स्वास्थ्य पर असर पड़ेगा।

“लैंगिक हिंसा सिर्फ कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं, यह सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट है। फिर भी आश्रय गृह, परामर्श और आपात सहायता व्यवस्था सेवाओं के लिए फंडिंग गंभीर रूप से अपर्याप्त है,” मुत्त्रेजा ने कहा।

बजट उन महिलाओं को भी नजरअंदाज करता है जो भारत की स्वास्थ्य प्रणाली की रीढ़ हैं। लगभग एक मिलियन ASHA और हजारों ANM कम वेतन, असुरक्षा और सीमित पेशेवर मान्यता के बावजूद बढ़ती जिम्मेदारियों के साथ काम कर रही हैं।

राष्ट्रीय हस्तशिल्प विकास कार्यक्रम में कटौती, ₹260 करोड़ से घटकर ₹205 करोड़, महिलाओं की आजीविका को कमजोर करती है। भारत के लगभग 75 प्रतिशत कारीगर महिलाएं हैं, जिन्हें क्रेडिट, डिजिटल प्लेटफॉर्म और बाजार तक पहुंच में समर्थन की जरूरत है।

“स्वास्थ्य, देखभाल, सुरक्षा या आजीविका—हर क्षेत्र में महिलाओं से कम संसाधनों में अधिक करने की उम्मीद की जाती है। इस तरह न तो अर्थव्यवस्थाएँ बढ़ती हैं, और न ही जनसांख्यिकीय लाभ हासिल होता है।,” मुत्त्रेजा ने कहा।

बजट 2026 भारत की विकास प्राथमिकताओं को साफ़ दिखाता है। महिलाओं के नेतृत्व वाले विकास को सच में आगे बढ़ाने के लिए भविष्य के बजटों में केवल मामूली बढ़ोतरी नहीं, बल्कि महिलाओं के स्वास्थ्य तंत्र, देखभाल ढांचे, सुरक्षा व्यवस्थाओं और आर्थिक अवसरों में लगातार निवेश करना होगा—इसे चैरिटी नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण के रूप में देखना होगा।

0